‘वंदे मातरम्’ को लेकर देश की सियासत तब गरमा गई जब कांग्रेस ने राष्ट्रगीत के सिर्फ पहले दो अंतरे गाने का फैसला लिया। इसके बाद से कांग्रेस पर तीखे प्रहार का दौर जारी है। गृह मंत्री अमित शाह से लेकर बीजेपी के कई नेताओं ने कांग्रेस के इस फैसले पर सवाल उठाए हैं। इसी बीच उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम के पूर्व अध्यक्ष एवं विधान परिषद सदस्य डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल ने भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक भारत में वंदे मातरम् का विरोध पूरी तरह विभाजनकारी राजनीति का हिस्सा था। वंदे मातरम् सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि देश के स्वाभिमान, राष्ट्रीय अस्मिता और स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों के अमर बलिदान से जुड़ा राष्ट्रीय भाव है। वंदे मातरम् के विरोध का इतिहास स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान की राजनीतिक परिस्थितियों से जुड़ा रहा है।
मोहम्मद अली जौहर का जिक्र
डॉ. लालजी प्रसाद ने मोहम्मद अली जौहर का जिक्र करते हुएआगे कहा कि मोहम्मद अली जौहर ने कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए अधिवेशन का बहिष्कार किया था। मोहम्मद अली जिन्ना ने भी 15 अक्टूबर 1937 को लखनऊ में मुस्लिम लीग की बैठक में वंदे मातरम् के विरोध का मुद्दा उठाया था। जिन्ना के विरोध के बाद वर्ष 1937 में कांग्रेस ने वंदे मातरम् के पूर्ण गायन पर रोक लगाने का निर्णय लिया था। वंदे मातरम् के विरोध को उस दौर की सांप्रदायिक और विभाजनकारी राजनीति से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
कठोर कार्रवाई की मांग
डॉ. लालजी प्रसाद ने कहा कि वंदे मातरम् के साथ देश की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले क्रांतिकारियों और राष्ट्रभक्तों की भावनाएं जुड़ी रही हैं। आजादी के बाद भी वंदे मातरम् को राष्ट्रीय जीवन में महत्वपूर्ण स्थान मिला और इसे संवैधानिक मान्यता प्राप्त है। डॉ. लालजी प्रसाद ने वंदे मातरम् के पूर्ण गायन का विरोध करने वालों के खिलाफ कठोर कारवाई की मांग की है।












