योगी सरकार ने भर्ती प्रक्रिया को बनाया पारदर्शी, युवाओं में भरोसे की नींव

योगी सरकार के 'उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परीक्षा अध्यादेश एवं विधेयक' ने नकल माफिया की रीढ़ तोड़ दी।

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार युवाओं के भविष्य को लेकर गंभीर है। चाहे वो युवाओं के रोजगार को लेकर हो या आर्थिक विकास को लेकर। परीक्षाओं में पारदर्शिता हर युवा की मांग रही है। योगी सरकार के नेतृत्व में यह संभव भी हो पाया है। अकसर अपनी जनसभाओं में सीएम योगी आदित्यनाथ पूर्व की सरकारों को घेरते रहे हैं। सीएम योगी का कहना है कि पूर्व सरकारों के राज में सालों तक राज्य में युवाओं को परीक्षाओं में धांधली, गड़बड़ी देखने को मिली। युवाओं का भविष्य संकट में था। साल 2017 में सीएम योगी आदित्यनाथ ने सत्ता संभाली तो उनके सामने बहुत बड़ी चुनौतियाँ थी। युवाओं को भविष्य को कैसे संकट से निकाल जाए, भर्ती प्रक्रिया और परीक्षाओं को कैसे पारदर्शी बनाया जाए यह चुनौतियाँ सीएम योगी के सामने खड़ी थी। लेकिन सीएम योगी के नेतृत्व में अब उत्तरप्रदेश की बदली हुई तस्वीर नजर आती है।

नकल माफिया पर कसा शिकंजा
योगी सरकार की रणनीति से आज उत्तर प्रदेश में विकास की धारा बह रही है। योगी सरकार के ‘उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परीक्षा अध्यादेश एवं विधेयक’ ने नकल माफिया की रीढ़ तोड़ दी। पेपर माफियाओं को अब कठोर से कठोर दंड दिया जा रहा है। दोषी पाए जाने पर 10 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है, एक करोड़ रुपये तक का आर्थिक दंड लगाया जा सकता है। वहीं संगठित अपराध में लिप्त व्यक्तियों और  संस्थानों की संपत्ति कुर्क-जब्त करने का भी प्रावधान किया गया है।

क्या रही योगी सरकार की रणनीति?
योगी सरकार ने फर्जी वेबसाइट, डिजिटल पेपर लीक नेटवर्क और साइबर धोखाधड़ी की निगरानी के लिए बड़ा कदम उठाया। भर्ती परीक्षाओं से एसटीएफ, साइबर सेल तथा इंटेलिजेंस यूनिट को जोड़ दिया गया। परीक्षा एजेंसियों, प्रिंटिंग यूनिट, ट्रांसपोर्ट नेटवर्क और परीक्षा केंद्र संचालकों तक की जवाबदेही तय की गई। कानून के साथ-साथ तकनीक का प्रयोग भी किया गया। परीक्षा केंद्रों पर मॉनिटरिंग की व्यवस्था की गई।  लिखित परीक्षा और मेधा यानी मेरिट आधारित पारदर्शी चयन प्रक्रिया पर जोर दिया गया। क्योंकि इंटरव्यू आधारित प्रणाली में अपनों को अधिक अंक देने की गुंजाइश सबसे अधिक रहती है।

सपा के राज में परीक्षाओं में धांधली
वहीं बात की जाए समाजवादी पार्टी के शासन काल की तो सपा सरकार में 2012 से 2017 के बीच प्रदेश में मात्र सवा लाख के आसपास सरकारी नौकरियां दी गईं। लेकिन योगी सरकार के नौ वर्षों के कार्यकाल में नौ लाख से अधिक युवाओं को सरकारी रोजगार मिला है। यह उपलब्धि किसी एक विभाग तक सीमित नहीं, बल्कि हर क्षेत्र में फैली है। पुलिस विभाग में कांस्टेबल से लेकर सब-इंस्पेक्टर तक और महिला पुलिसकर्मियों की रिकॉर्ड नियुक्तियां हुईं। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के जरिए भी पदों के चयन में निरंतरता बढ़ी। युवाओं को हर स्तर पर अवसर देने के लिए योगी सरकार ने प्रयास किया।

युवाओं में लौटा विश्वास
2012 से 2017 के बीच प्रदेश की भर्ती प्रक्रिया लगातार विवादों में घिरी रही। दरोगा भर्ती से लेकर शिक्षक भर्ती तक, अनेक परीक्षाओं पर पक्षपात, पर्चा लीक और चयन में मनमानी के आरोप लगते रहे। युवाओं का एक बड़ा वर्ग यह मानने लगा था कि बिना सिफारिश या राजनीतिक पहुंच के सरकारी नौकरी पाना लगभग असंभव है।योगी सरकार ने इस भरोसे के संकट को केंद्र में रखकर काम किया और परिणाम आज युवाओं के विश्वास के रूप में सामने है। हालांकि ऐसा नहीं है कि ऐसे नहीं कि चुनौतियां पूरी तरह खत्म हो गई हैं लेकिन अब भर्तियों को लेकर युवाओं में पारदर्शिता का भाव है।

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